AI एक वरदान या अभिशाप In 2024 ,टेक्नोलॉजीज क्या सच में आपकी दोस्त हैं ?

WHAT IS AI ?

आज हम में से बहुत से लोगो को ChatGPT के बारे में पता है क्यूंकी हम सब सोशल मीडिया और फ़ोन के थ्रू इसके बारे में कंटेंट पढ़ रहे है | लेकिन ChatGPT के बारे में सुदूर गांव में बैठा एक बच्चा शायद ही जनता होगा लेकिन आज हर वो इंसान जो मोबाइल यूज़ करता है, वो जाने अनजाने में ChatGPT और ऐसे ही कई दूसरे AI बेस्ड टूलस को यूज़ कर रहा है चाहे वो घर में काम करने वाली एक बाई हो या किसी बड़ी कंपनी में बैठा एक सीईओ| हर कोई इसे यूज़ करता है, फ़र्क़ सिर्फ इतना है कि कोई इनको जानने के बाद यूज़ कर रहा है तो कोई बिना इन्हे सही से जाने| लेकिन दोस्तों क्या AI टेक्नोलॉजी का इतना ज्यादा इस्तेमाल सही है? या टेक्नोलॉजी पर इतनी ज्यादा डिपेंडेंसी हम इंसानों को किसी बड़े खतरे की ओर ले जा रही है| ये बहुत बड़ा सवाल है जिसका जवाब हम आपको देंगे अपनी आज की इस पोस्ट में, तो इस पोस्ट को अंत तक जरूर पढ़ें |

दोस्तों ChatGPT एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल है और ये कितना फेमस है ये तो हम सभी जानते हैं| लेकिन क्या आपको पता है की उस इंसान की इस टेक्नोलॉजी पर क्या राय है जिसे इस टेक्नोलॉजी का फादर कहा जाता है| जी हाँ दोस्तों हम बात कर रहे हैं जेफ्री हिंटन की जिन्होंने सन 2012 में अपने दो साथियों के साथ मिलकर एक ऐसे प्रोजेक्ट पर काम किया जिसके आधार पर ही आज chatgpt और दूसरे AI टूल्स काम करते हैं| दरअसल 2012 में उन्होंने एक न्यूरल नेटवर्क डेवेलप किया जो हज़ारों तस्वीरों को एक्सामिन करके उन्हें पहचानता था| और इसी से DNN रिसर्च की शुरुवात हुयी जिसे गूगल ने खरीद लिया और जेफ्री ने गूगल के लिए काम करना शुरू कर दिया और गूगल ब्रेन की स्थापना कर दी जो AI के डेवलपमेंट पर काम करने वाली एक स्पेशल टीम थी| जेफ्री ने यूँ तो बहुत से प्रोजेक्ट्स को लीड किया लेकिन अंत में उन्हें एहसास हो गया की वो जिस चीज़ को बना रहे हैं इंसान उसके लायक हैं ही नहीं और उन्होंने गूगल से इस्तीफ़ा दे दिया| लेकिन वो इसे रोक नहीं पाए और उन्ही की रिसर्च के आधार पर आज चैट जीपीटी और अन्य AI टूल डेवेलोप डेवेलप किए गए हैं | | लेकिन अब आप सोच रहे होंगे की जो चीज़ हमारी इतनी मदत करती है, उसमे भला ऐसी क्या खराबी थी जो जेफ्री इसे नहीं बनाना चाहते थे| दरअसल इसके पीछे भी एक बड़ी वजह है, जेफ्री को ये एहसास हो गया की इंसान अभी इसके लिए तैयार नहीं है क्यूंकि हम मशीनों को खुद से ज्यादा बेहतर मानने लगते हैं और उसी की बताई चीज़ों को सच मानने लगते हैं| जबकि उनके अनुसार AI टूल्स की वजह से गलत इनफार्मेशन का चलन तेजी से बढ़ेगा और कोई भी ये नहीं बता पाएगा कि सच क्या है| इसके अलावा जेफ्री हिंटन ने कहा कि ये भी एक चुनौती होगी कि किस तरह गलत लोगों को AI के बुरे इस्तेमाल से रोका जाएगा| लेकिन गलत इनफार्मेशन के आलावा आखिर वो कौन से गलत इस्तेमाल थे जिसको लेके वो इतने परेशान थे, ,अब आइये जरा इनपर भी नज़र डाल लेते हैं|

AI के फायदे और नुकसान

अब जैसा की आप सभी देख रहे हैं की मोबाइल फ़ोन आजकल हर इंसान की लाइफ का एक बहुत ही इम्पोर्टेन्ट पार्ट हो गया हैं, लोग एक वक़्त बिना खाने के बेशक रह सकते हैं , लेकिन 5 मिनट बिना अपने फ़ोन के नहीं रह सकते हैं। फ़ोन का उनका ये एडिक्शन काफी हद तक फ़ोन में दिए गए AI को लेकर भी होता हैं , क्यूंकि AI की मदद से हमारा काम बिना किसी परेशानी के बड़ी आसानी से हो जाता हैं तो हमें धीरे धीरे इसकी आदत लगने लग जाती हैं। इवन हमें इसकी इतनी आदत पड़ जाती हैं की हम रास्ते याद रखने की जगह गूगल मैप से रास्ता पूछने लगते हैं , और अपनी मेमोरी को रिकॉल नहीं करते हैं , खुद से नोट्स बनाने की बजाय चैट GPT से हेल्प ले लेते हैं। AI हमें वो हर काम बड़ी ही आसानी से करके दे देता हैं जिसको करने में हमें मेंटली काफी मशक्कत करनी पड़ती हैं।

साथ ही AI बेस्ड गेम से लोगों का काफी एंटरटेनमेंट भी होता हैं और अब लोग बाहर जाकर आउटडोर गेम खेलने की बजाय घंटो मोबाइल पर ही हाई टेक Ai बेस्ड गेम्स खेल लेते हैं , जिसमे उन्हें रियल लाइफ एक्सपीरियंस जैसा माहौल इन Ai की हेल्प से क्रिएट करके दिया जाता हैं जो उनके लिए कहीं न कहीं एक एडिक्शन का काम करता हैं , इवन इन Ai को लेकर उनका ये एडिक्शन इतना हो जाता हैं की इसे आप किसी अलकोहल या फिर ड्रग्स के नशे से compare कर सकते हैं। खासकर के बात करें अगर बच्चों की जो हद से ज्यादा टेक्नोलॉजीज पर डिपेंड हो गए हैं और इन AI गैजेट्स की मदद लेते हैं। बच्चों में specially यंग age ग्रुप में सोशल मीडिया , और फ़ोन एक एडिक्शन हो गया हैं| अगर हम कुछ रिपोर्ट्स की माने तो उसमे ये बात सामने आयी हैं की एक नार्मल इंसान लगभग अपने दिन का 6 से 7 घंटे का समय फ़ोन स्क्रीन पर गुजारता हैं , ऐसे में वो कहीं न कहीं फ़ोन के फीचर्स, फ़ोन में दिए गए AI पर पूरी तरह से डिपेंड हो जाता हैं।

अब बच्चे बाहर निकलकर गेम नहीं खेलते बल्कि ऑनलाइन कंप्यूटर पर AI बेस्ड गेम खेल लेते हैं , इस से उनकी बॉडी में वो एक्सरसाइज नहीं हो पाता हैं , उनका ब्रेन उतना एक्टिव नहीं हो पाता हैं और वो फिजिकली और मेंटली कहीं न कहीं वीक रह जाते हैं। हमारा ये ऑनलाइन वर्ल्ड और सोशल मीडिया कई बार काफी अच्छे के लिए भी होता हैं जैसे हमें कोई भी इनफार्मेशन तुरंत मिल जाती हैं , कोई ऐसा काम जिसे हम दूर होने की वजह से नहीं कर पाते हैं , इस ऑनलाइन वर्ल्ड के माध्यम से हम वो काम easily कर लेते हैं। लेकिन जब इंसानी फायदे के लिए बनायीं गई चीजें उसके लिए एक एडिक्शन का काम करने लगे तो हमे वहीँ रुकना चाहिए और सोचना चाहिए is it really helpful ? क्यूंकि ये Ai बेसक हमारी परेशानियों को कम कर सकती हैं लेकिन हमें फिट एंड healthy तो नहीं रख सकती।

इसलिए हमें Ai का इस्तेमाल करते वक़्त ये जरूर ध्यान देना चाहिए की बेसक हम अपनी परेशानियों को कम करने के लिए इसका इस्तेमाल करें लेकिन इसके इस्तेमाल में खुद की क्रिएटिविटी और कैपबिलिटी को कम न कर ले , अपनी स्किल्स को न ख़तम कर ले , क्यूंकि बेसक Ai को हम इंसानो ने ही बनाया हैं लेकिन जब हम इंसान अपनी ही बनायीं हुई चीजों पर डिपेंड करने लगेंगे तो हम आगे कुछ नया और revolutionary नहीं सोच पाएंगे। क्यूंकि Ai helpful तो हैं लेकिन हमें इसकी हेल्प कहाँ तक लेनी हैं, इसका लिमिट सेट करने का रिमोट कण्ट्रोल हमेसा खुद के ही हाथ में होना चाहिए तो आप अपनी लाइफ में AI पर कितने ज्यादा depend हैं , हमें कमेंट करके जरूर बताएं , और पोस्ट पसंद आया हो तो इसे लाइक करके हमारे वेबसाइट को follow जरूर कर ले।

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